हींग लगे ना फिटकरी
बाज़ार में आजकल एक सामान तो खूब गिरा है . नया -पुराना , आधा -अधूरा , नरम -गरम , कच्चा- पक्का , सूखा -गीला ….हर वेरायटी ..आप जो चाहे ले जाओ सब बिकता है और खूब बिकता है .
नहीं समझे क्या सामान है ? वो है लेखक . लेखकों से मंडी भरी पड़ी है . मज़े की बात यह है कि जिस रफतार से लेखकों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है उसकी दुगनी चौगुनी रफतार से पाठक घटते जा रहे हैं, जैसे उन को कोई महामारी लीले जा रही है . ऐसा लगता है कि पाठक प्रजाति को बहुत जल्दी दुर्लभ और विलुप्तप्राय घोषित कर दिया जायेगा .
असल में जब से लेखन के लिए भाषा ग्यान और विषय की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी तभी से कुकुरमुत्ते जैसे लेखक गली कूचों और कोने किनारों में बहुतायत से अपनी दुकानें सजा कर बैठने लग गए . बिकने के लिए तैयार इनके माल में राजनैतिक पार्टियों को गाली गलौज , अभद्र भाषा और चटखारे दार बातों के मसाले जितने अधिक हों , बाज़ार पर उसका उतना ही बड़ा कब्जा हो जाता है . इनकी सच्ची झूठी चटक खबरें ही कोमा में जा चुके पाठक को एनर्जी बूस्टर का इंजेक्शन दे कर नींद से जगा पाती हैं और फिर मुँह में लगे खून की तरह पाठक फिर फिर उन्ही मसालेदार रचनाओं को दर दर ढूँढता फिरता है .
इस मसाला लेखन को चार चाँद लगा दिये इंटरनेट पर हिन्दी लिखने की सुविधा ने . अब तो क्या कहने , जिसके पास भी सरकार को कोसने , विरोधियों को गाली देने और सेलेब्रिटीज की लाइफ में झांकने के लिए कोई न कोई छिद्र खोज लेने की क्षमता है , वो अंतरजाल पर खुद को लेखक के सिन्हासन पर सुशोभित कर सकता है . इतने से भी मन नहीं भरता तो किसी बेचारे ने जो अक्षर अक्षर ,मात्रा मात्रा जोड़ कर खून पसीने से कोई रचना लिखी होगी , उसको यह स्वयंभू लेखक पलक झपकते ही आँख से काजल की तरह ले उड़ते हैं और चोरी की गयी कार की तरह तुरत फुरत , नंबर प्लेट हटा कर नकली नंबर प्लेट चेप कर रोड पर उतार देते हैं ..यानि कि चोरी की रचना को अपने नाम से पोस्ट कर देते हैं. अरे भाई , लेखन इतना तो सस्ता हो चुका है अब और क्या चाहिए जो चोरी करते हो . अब क्या कोई आपके घर आकर अपनी पांडुलिपि आपको क्षमायाचना सहित समर्पित कर जाये …
आज से तीसेक साल पहले , लेखकों और कवियों की संख्या को उंगली पर गिना जा सकता था . पर अब, अब तो इतने हैं कि गिनने के लिए सर के बाल भी कम पड़ जायें . मुश्किल तो यह है कि सब को छपना भी है और सब को प्रसिद्ध भी होना है . इसलिये दाम दो अवार्ड लो . मार्केट में मार मची है . लोग दाम ले लेकर खड़े हैं . जो जितना ऊँचा दाम चुका ले जाता है उतना ही ऊँचा पुरस्कार हथिया ले जाता है . उसने लिखा क्या है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता .
आप इंटरनेट पर रोज़ ही ऐड देख सकते हैं …
“आइये आइये , मेहरबान कदरदान, साथ में लाइये अपनी लेखन की दुकान . हमें चुकाइये दाम और पुरस्कार आपके नाम . लकड़ी ,मिट्टी ,गिलट से बना , चिडिया, कौवा, चील या गिद्ध की डिज़ाइन वाला , एक हाथ, दो हाथ ,दस हाथ वाला , जैसा दाम वैसा इनाम …. कौड़ियों के मोल ले जाइये ,अपने ड्राइंग रुम की शोभा बढ़ाइये और मित्रों पर धाक जमाइये . “
पैसा तो वैसे भी हाथ की मैल है . क्या रखा है दोस्तों . इन्सान की कमाई अगर एक अवार्ड न खरीद सके तो किस काम की . वैसे भी कौन जान ही पायेगा कि इन सजे हुए पुरस्कारों को किसी ने सादे कागज़ पर पेन से लिख कर प्राप्त किया गया है या सरकारी बैंक के छापेखाने में छपे हुए कलदार सूती कपड़े से ..
(यहाँ आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नोट जिस पर छापा जाता है वो कागज़ नहीं बल्कि विशेष प्रकार का सूती कपड़ा होता है . पर इस बात का उपरोक्त कथन से कोई संबंध नहीं है. )
बरसों पहले कबीर दास जी ने अपने लिए कहा था …
“मसि कागज़ छूयो नहीं , कलम गही नहि हाथ ..”
हाय रे कबीर जी यह आप क्या कह गए …
आपकी फक्कड लोककल्याणकारी अनमोल रचनाओं पर तो लोग कान नहीं देते और बस कलम ना छूने वाली बात को ब्रह्मवाक्य मान कर लेखक दर लेखक अवतरित होते जा रहे हैं . नहीं अब और नहीं … कबीर दास जी ,आप ही ने यह भी कहा था कि –
“कबिरा खड़ा बजार में , लिए लुआठी हाथ ….”
हाँ तो कबीर दास जी अपनी लुआठी लेकर आइये और हमें इस आसमानी आफत से बचाइये
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गुरुवार, 28 दिसंबर 2017
गुरुवार, 21 दिसंबर 2017
जुड़ाव या जकड़न
जुड़ाव या जकड़न
अक्सर लोग कहते मिलते हैं कि अगर मैं 300 रुपये की घड़ी पहनू या 30,000 की, दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी.मैं 300 गज के मकान में रहूं या 300 एकड़ के महल में, सर पर छत एक बराबर ही होगी. यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूँ या इकोनोमी क्लास में,अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा. या फिर ये कि मैं यदि किसी मंहगी ब्रांड का फोन ले भी लूँ तो भी बातें तो वही होंगी जो सस्ते फोन से होती हैं. वो यह भी कहते हैं कि क्या यह ज़रूरी है कि मैं अपनी हर बात में दो चार अंग्रेजी शब्द शामिल करूँ तभी सभ्य कहलाऊंगा. मैं तो देहाती गंवार ही भला .
अक्सर लोग कहते मिलते हैं कि अगर मैं 300 रुपये की घड़ी पहनू या 30,000 की, दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी.मैं 300 गज के मकान में रहूं या 300 एकड़ के महल में, सर पर छत एक बराबर ही होगी. यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूँ या इकोनोमी क्लास में,अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा. या फिर ये कि मैं यदि किसी मंहगी ब्रांड का फोन ले भी लूँ तो भी बातें तो वही होंगी जो सस्ते फोन से होती हैं. वो यह भी कहते हैं कि क्या यह ज़रूरी है कि मैं अपनी हर बात में दो चार अंग्रेजी शब्द शामिल करूँ तभी सभ्य कहलाऊंगा. मैं तो देहाती गंवार ही भला .
उनके किस्से यही होते हैं कि पहले लोग लालटेन की रोशनी में पढ़ कर बड़े बड़े अफसर बन जाते थे. अब तो पढ़ने के लिए एेसी क्लास रुम चाहिए….. वगैरह वगैरह ..
लेकिन यह सोच बड़ी गलत है और विकास के रास्ते में बहुत ही बाधक है. अगर लालटेन की रोशनी ही सब कुछ थी तो बिजली का अविष्कार करने की क्या ज़रूरत थी.
जिस ज़माने में सूरज डूबते ही खाना खा कर लोग लालटेन धीमी कर के सो जाते थे, तब भी सुखी ही थे . पैदल चलते थे या हद से हद, अमीरों के पास साईकिलें होती थीं, वो ज़माना भी ठीक ही था. कारें, हवाईजहाज नहीं थे तो क्या लोग मर जाते थे ? फोन नहीं थे, किसी को किसी का समाचार मिलने में महीनों लग जाते थे तो क्या कोई जीता न था ?
आज यदि इंसान ने अपनी मेहनत से आगे बढ़ कर विकास किया है तो किस लिए? क्या उस को हर समय कोस-कोस कर पुराने असुविधा वाले दिनों का झूठा बखान करने के लिए ?
ऐसा नहीं है …
ऐसा कहना कि ब्रांडेड चीजें झूठी होती हैं, जिनका असल उद्देश्य तो “अमीरों के पैसे का दिखावा करना” होता है, बिलकुल गलत है .
किसी के चेहरे पर उसका परिश्रम नहीं लिखा रहता है. उसकी महंगी घड़ी और ब्रांडेड कपड़े दूर से ही उनको पाने के लिए की गयी मेहनत के बारे में बता देते हैं. उनका मखमली स्पर्श एक सुकून और मेहनत का फल पाने की तसल्ली का एहसास दिलाता है. मंहगे फोन एक बार पैसा माँग कर चुप हो जाते हैं जबकि सस्ते फोन बात तो कराते हैं लेकिन जब तक जीते हैं तब तक कभी बैट्री, कभी आवाज़ तो कभी नेटवर्क को लेकर रुलाते ही रहते हैं. तब लगता है कि काश हम भी मेहनत करते तो आज छोटी-छोटी बातों मे परेशान होकर समय न गंवा रहे होते.
अंग्रेजी या अन्य भाषायें सीखना हर किसी के बस की बात नहीं. जो सीख लेते हैं उनका आत्मविश्वास दूर से ही पहचान में आता है. उनको फिर कहीं भी, कभी भी, किसी से भी मिलने में हिचकिचाहट नहीं होती. उनको ताना मारने वाले दरअसल हीनभावना से ग्रस्त होते हैं. खुद जीवन में असफल रहे इसीलिये किसी और की सफलता देखी नहीं जाती.
यह हीनभावना ग्रस्त लोग अक्सर यह भी कहते हैं कि …
मेरे कपड़े तो आम दुकानों से खरीदे हुए होते हैं..
मैं दोस्तों के साथ किसी ढाबे पर भी बैठ जाता हूँ..
भूख लगे तो किसी ठेले से ले कर खाने मे भी कोई अपमान नहीं समझता..
अपनी सीधी सादी देहाती भाषा मे बोलता हूँ..
चाहूँ तो यह कर सकता हूँ .
चाहूँ तो वह कर सकता हूँ …
लेकिन सच तो यह है कि वो कुछ नहीं कर सकते क्यूँकि उनके अन्दरूनी संस्कार आज भी उस पशु के समान हैं जो रोटी मिलने पर आधी खाकर, आधी भुखमरी के दिनों की आशंका में मिट्टी में छुपा देता है.
आप उनसे कहिये कि अगर वास्तव में उन्हें उन लोगों की चिंता है, जिनके पूरे सप्ताह भर के राशन की कीमत एक ब्रांडेड कमीज के बराबर है तो उन्हे ऊँचा उठना सिखाइये. ब्रांड बनाने वाले ने भी अपना स्तर ऊँचा करने के लिए बड़ी मेहनत की है. ऐसे ही नहीं कोई उन पर अपनी मेहनत के पैसे फेंक देता है. ऊँचा उठें तभी सारी दुनिया दिखाई देगी वर्ना जीवन तो कुएं के मेंढक का भी सुख से ही बीतता है.
परिवर्तन और इवोल्यूशन प्रकृति का नियम है. समय हर पल बदल रहा है और जीवन हर समय विकसित हो रहा है. अपनी जड़ों से जुड़ाव अच्छी बात है लेकिन जुड़ाव को जकड़न नहीं बनने देना चाहिए. जकड़न सिर्फ गला घोंटती है और कभी-कभी जान भी ले लेती है. इसलिये उठिये, परिवर्तित होइये, विकसित होइये और प्रकृति के नियमों को सिद्ध करने में अपना भी योगदान दीजिये.
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शनिवार, 18 नवंबर 2017
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
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