गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

हींग लगे ना फिटकरी

हींग लगे ना फिटकरी





बाज़ार में आजकल एक सामान तो खूब गिरा है . नया -पुराना , आधा -अधूरा , नरम -गरम , कच्चा- पक्का , सूखा -गीला ….हर वेरायटी ..आप जो चाहे ले जाओ सब बिकता है और खूब बिकता है .
नहीं समझे क्या सामान है ? वो है लेखक . लेखकों से मंडी भरी पड़ी है . मज़े की बात यह है कि जिस रफतार से लेखकों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है उसकी दुगनी चौगुनी रफतार से पाठक घटते जा रहे हैं, जैसे उन को कोई महामारी लीले जा रही है . ऐसा लगता है कि पाठक प्रजाति को बहुत जल्दी दुर्लभ और विलुप्तप्राय घोषित कर दिया जायेगा .
असल में जब से लेखन के लिए भाषा ग्यान और विषय की अनिवार्यता समाप्त कर दी गयी तभी से कुकुरमुत्ते जैसे लेखक गली कूचों और कोने किनारों में बहुतायत से अपनी दुकानें सजा कर बैठने लग गए . बिकने के लिए तैयार इनके माल में राजनैतिक पार्टियों को गाली गलौज , अभद्र भाषा और चटखारे दार बातों के मसाले जितने अधिक हों , बाज़ार पर उसका उतना ही बड़ा कब्जा हो जाता है . इनकी सच्ची झूठी चटक खबरें ही कोमा में जा चुके पाठक को एनर्जी बूस्टर का इंजेक्शन दे कर नींद से जगा पाती हैं और फिर मुँह में लगे खून की तरह पाठक फिर फिर उन्ही मसालेदार रचनाओं को दर दर ढूँढता फिरता है .
इस मसाला लेखन को चार चाँद लगा दिये इंटरनेट पर हिन्दी लिखने की सुविधा ने . अब तो क्या कहने , जिसके पास भी सरकार को कोसने , विरोधियों को गाली देने और सेलेब्रिटीज की लाइफ में झांकने के लिए कोई न कोई छिद्र खोज लेने की क्षमता है , वो अंतरजाल पर खुद को लेखक के सिन्हासन पर सुशोभित कर सकता है . इतने से भी मन नहीं भरता तो किसी बेचारे ने जो अक्षर अक्षर ,मात्रा मात्रा जोड़ कर खून पसीने से कोई रचना लिखी होगी , उसको यह स्वयंभू लेखक पलक झपकते ही आँख से काजल की तरह ले उड़ते हैं और चोरी की गयी कार की तरह तुरत फुरत , नंबर प्लेट हटा कर नकली नंबर प्लेट चेप कर रोड पर उतार देते हैं ..यानि कि चोरी की रचना को अपने नाम से पोस्ट कर देते हैं. अरे भाई , लेखन इतना तो सस्ता हो चुका है अब और क्या चाहिए जो चोरी करते हो . अब क्या कोई आपके घर आकर अपनी पांडुलिपि आपको क्षमायाचना सहित समर्पित कर जाये …
आज से तीसेक साल पहले , लेखकों और कवियों की संख्या को उंगली पर गिना जा सकता था . पर अब, अब तो इतने हैं कि गिनने के लिए सर के बाल भी कम पड़ जायें . मुश्किल तो यह है कि सब को छपना भी है और सब को प्रसिद्ध भी होना है . इसलिये दाम दो अवार्ड लो . मार्केट में मार मची है . लोग दाम ले लेकर खड़े हैं . जो जितना ऊँचा दाम चुका ले जाता है उतना ही ऊँचा पुरस्कार हथिया ले जाता है . उसने लिखा क्या है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता . 
आप इंटरनेट पर रोज़ ही ऐड देख सकते हैं …
“आइये आइये , मेहरबान कदरदान, साथ में लाइये अपनी लेखन की दुकान . हमें चुकाइये दाम और पुरस्कार आपके नाम . लकड़ी ,मिट्टी ,गिलट से बना , चिडिया, कौवा, चील या गिद्ध की डिज़ाइन वाला , एक हाथ, दो हाथ ,दस हाथ वाला , जैसा दाम वैसा इनाम …. कौड़ियों के मोल ले जाइये ,अपने ड्राइंग रुम की शोभा बढ़ाइये और मित्रों पर धाक जमाइये . “
पैसा तो वैसे भी हाथ की मैल है . क्या रखा है दोस्तों . इन्सान की कमाई अगर एक अवार्ड न खरीद सके तो किस काम की . वैसे भी कौन जान ही पायेगा कि इन सजे हुए पुरस्कारों को किसी ने सादे कागज़ पर पेन से लिख कर प्राप्त किया गया है या सरकारी बैंक के छापेखाने में छपे हुए कलदार सूती कपड़े से ..
(यहाँ आपकी जानकारी के लिए बता दें कि नोट जिस पर छापा जाता है वो कागज़ नहीं बल्कि विशेष प्रकार का सूती कपड़ा होता है . पर इस बात का उपरोक्त कथन से कोई संबंध नहीं है. )
बरसों पहले कबीर दास जी ने अपने लिए कहा था …
“मसि कागज़ छूयो नहीं , कलम गही नहि हाथ ..”
हाय रे कबीर जी यह आप क्या कह गए … 
आपकी फक्कड लोककल्याणकारी अनमोल रचनाओं पर तो लोग कान नहीं देते और बस कलम ना छूने वाली बात को ब्रह्मवाक्य मान कर लेखक दर लेखक अवतरित होते जा रहे हैं . नहीं अब और नहीं … कबीर दास जी ,आप ही ने यह भी कहा था कि –
“कबिरा खड़ा बजार में , लिए लुआठी हाथ ….”
हाँ तो कबीर दास जी अपनी लुआठी लेकर आइये और हमें इस आसमानी आफत से बचाइये

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