गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

जुड़ाव या जकड़न

जुड़ाव या जकड़न

अक्सर लोग कहते मिलते हैं कि अगर मैं 300 रुपये की घड़ी पहनू या 30,000 की, दोनों समय एक जैसा ही बताएंगी.मैं 300 गज के मकान में रहूं या 300 एकड़ के महल में, सर पर छत एक बराबर ही होगी. यदि मैं बिजनेस क्लास में यात्रा करूँ या इकोनोमी क्लास में,अपनी मंजिल पर उसी नियत समय पर ही पहुँचूँगा. या फिर ये कि मैं यदि किसी मंहगी ब्रांड का फोन ले भी लूँ तो भी बातें तो वही होंगी जो सस्ते फोन से होती हैं. वो यह भी कहते हैं कि क्या यह ज़रूरी है कि मैं अपनी हर बात में दो चार अंग्रेजी शब्द शामिल करूँ तभी सभ्य कहलाऊंगा. मैं तो देहाती गंवार ही भला .
उनके किस्से यही होते हैं कि पहले लोग लालटेन की रोशनी में पढ़ कर बड़े बड़े अफसर बन जाते थे. अब तो पढ़ने के लिए एेसी क्लास रुम चाहिए….. वगैरह वगैरह ..
लेकिन यह सोच बड़ी गलत है और विकास के रास्ते में बहुत ही बाधक है. अगर लालटेन की रोशनी ही सब कुछ थी तो बिजली का अविष्कार करने की क्या ज़रूरत थी.
जिस ज़माने में सूरज डूबते ही खाना खा कर लोग लालटेन धीमी कर के सो जाते थे, तब भी सुखी ही थे . पैदल चलते थे या हद से हद, अमीरों के पास साईकिलें होती थीं, वो ज़माना भी ठीक ही था. कारें, हवाईजहाज नहीं थे तो क्या लोग मर जाते थे ? फोन नहीं थे, किसी को किसी का समाचार मिलने में महीनों लग जाते थे तो क्या कोई जीता न था ?
आज यदि इंसान ने अपनी मेहनत से आगे बढ़ कर विकास किया है तो किस लिए? क्या उस को हर समय कोस-कोस कर पुराने असुविधा वाले दिनों का झूठा बखान करने के लिए ?
ऐसा नहीं है …
ऐसा कहना कि ब्रांडेड चीजें झूठी होती हैं, जिनका असल उद्देश्य तो “अमीरों के पैसे का दिखावा करना” होता है, बिलकुल गलत है .
किसी के चेहरे पर उसका परिश्रम नहीं लिखा रहता है. उसकी महंगी घड़ी और ब्रांडेड कपड़े दूर से ही उनको पाने के लिए की गयी मेहनत के बारे में बता देते हैं. उनका मखमली स्पर्श एक सुकून और मेहनत का फल पाने की तसल्ली का एहसास दिलाता है. मंहगे फोन एक बार पैसा माँग कर चुप हो जाते हैं जबकि सस्ते फोन बात तो कराते हैं लेकिन जब तक जीते हैं तब तक कभी बैट्री, कभी आवाज़ तो कभी नेटवर्क को लेकर रुलाते ही रहते हैं. तब लगता है कि काश हम भी मेहनत करते तो आज छोटी-छोटी बातों मे परेशान होकर समय न गंवा रहे होते.
अंग्रेजी या अन्य भाषायें सीखना हर किसी के बस की बात नहीं. जो सीख लेते हैं उनका आत्मविश्वास दूर से ही पहचान में आता है. उनको फिर कहीं भी, कभी भी, किसी से भी मिलने में हिचकिचाहट नहीं होती. उनको ताना मारने वाले दरअसल हीनभावना से ग्रस्त होते हैं. खुद जीवन में असफल रहे इसीलिये किसी और की सफलता देखी नहीं जाती.
यह हीनभावना ग्रस्त लोग अक्सर यह भी कहते हैं कि …
मेरे कपड़े तो आम दुकानों से खरीदे हुए होते हैं..
मैं दोस्तों के साथ किसी ढाबे पर भी बैठ जाता हूँ..
भूख लगे तो किसी ठेले से ले कर खाने मे भी कोई अपमान नहीं समझता..
अपनी सीधी सादी देहाती भाषा मे बोलता हूँ..
चाहूँ तो यह कर सकता हूँ .
चाहूँ तो वह कर सकता हूँ …
लेकिन सच तो यह है कि वो कुछ नहीं कर सकते क्यूँकि उनके अन्दरूनी संस्कार आज भी उस पशु के समान हैं जो रोटी मिलने पर आधी खाकर, आधी भुखमरी के दिनों की आशंका में मिट्टी में छुपा देता है.
आप उनसे कहिये कि अगर वास्तव में उन्हें उन लोगों की चिंता है, जिनके पूरे सप्ताह भर के राशन की कीमत एक ब्रांडेड कमीज के बराबर है तो उन्हे ऊँचा उठना सिखाइये. ब्रांड बनाने वाले ने भी अपना स्तर ऊँचा करने के लिए बड़ी मेहनत की है. ऐसे ही नहीं कोई उन पर अपनी मेहनत के पैसे फेंक देता है. ऊँचा उठें तभी सारी दुनिया दिखाई देगी वर्ना जीवन तो कुएं के मेंढक का भी सुख से ही बीतता है.
परिवर्तन और इवोल्यूशन प्रकृति का नियम है. समय हर पल बदल रहा है और जीवन हर समय विकसित हो रहा है. अपनी जड़ों से जुड़ाव अच्छी बात है लेकिन जुड़ाव को जकड़न नहीं बनने देना चाहिए. जकड़न सिर्फ गला घोंटती है और कभी-कभी जान भी ले लेती है. इसलिये उठिये, परिवर्तित होइये, विकसित होइये और प्रकृति के नियमों को सिद्ध करने में अपना भी योगदान दीजिये.

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